आजीवन कारावास मृत्युदंड से कही ज्यादा ज्यादा बदतर । राजीव गांधी के हत्यारों को फरलो और पैरोल मुझे क्यू नही : स्वामी श्रद्धानंद


राजीव गांधी के हत्यारे छूट गए मुझे भी रिहाई दें,स्वामी श्रद्धानंद की सुप्रीम कोर्ट से अपील

राजीव गांधी के हत्यारों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पिछले दिनों जेल से रिहा कर दिया गया था। अब उस फैसले के आधार पर अन्य कैदी भी ऐसी ही मांग कर सकते हैं। इसकी शुरुआत पत्नी की हत्या में उम्रकैद की सजा काट रहे स्वामी श्रद्धानंद ने कर दी है। श्रद्धानंद ने कोर्ट में अर्जी दाखिल कर समानता के अधिकार का हवाला देते हुए रिहाई की मांग की है। श्रद्धानंद के वकील वरुण ठाकुर ने चीफ जस्टिस डी.वाई.चंद्रचूड़ (D.Y. Chandrachud) की बेंच के समक्ष कहा कि स्वामी श्रद्धानंद लगातार 29 साल से जेल के अंदर है। उसे एक बार फिर पेरोल पर बाहर निकलने का मौका नहीं मिला है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए राजीव के हत्यारे को छोड़ा
  • 31 साल से जेल में बंद पेरारिवलन को छोड़ने के लिए राज्य मंत्रिमंडल ने की थी सिफारिश
  • राज्यपाल ने फाइल राष्ट्रपति को भेजी, सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐक्शन पर गहरी नाराजगी जताई थी
  • हत्या के आरोप में फांसी, 11 साल की देरी पर दया याचिका का निपटारा, फांसी उम्रकैद में बदलती है और अब रिहाई का फैसला आया है। 
  • राज्य मंत्रिमंडल ने प्रासंगिक विचार-विमर्श के आधार पर फैसला किया था। अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए, दोषी को रिहा किया जाना उचित होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कैदी के वकील से कहा कि किसी भी आरोपी को दोषसिद्धि के आधार पर मृत्युदंड मांगने का अधिकार नहीं है। आप अपनी जान नहीं ले सकते क्योंकि यह भी एक अपराध है।

राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी ठहराए गए ए.जी. पेरारिवलन की यही पूरी कहानी है। उनकी रिहाई का रास्ता उसी दिन साफ हो गया था जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि अगर जेल में कम समय की सजा काटने वाले लोगों को रिहा किया जा रहा है तो इस मामले में क्यों नहीं? आखिरकार आज देश की सबसे बड़ी अदालत ने राजीव गांधी के हत्यारे पर 'सुप्रीम' फैसला ले लिया। उम्रकैद की सजा पाए 31 साल से जेल में बंद दोषी ए.जी. पेरारिवलन को रिहा करने का सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है। 

न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को गलत बताते हुए स्पष्ट कहा था कि वह राज्य मंत्रिमंडल के परामर्श से बंधे हुए हैं। आइए इस बहुचर्चित मामले की कहानी समझते हैं।

अपनी पत्नी की हत्या के लिए 30 साल से जेल में बंद 84 साल के शख्स ने आजीवन कारावास को मृत्युदंड से कहीं अधिक बदतर बताया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 सितंबर, 2024) को कहा कि आप चाहते हैं कि आपकी सजा को फांसी में बदल दिया जाए। स्वामी श्रद्धानंद उर्फ ​​मुरली मनोहर मिश्रा ने रिहाई का अनुरोध करते हुए कहा कि वह बिना किसी पैरोल के लगातार 30 साल से जेल में हैं और इस दौरान उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल मामला दर्ज नहीं किया गया है।

श्रद्धानंद की पत्नी शकेरेह मैसूर की तत्कालीन रियासत के पूर्व दीवान सर मिर्जा इस्माइल की पोती थीं। उनकी शादी अप्रैल 1986 में हुई थी और मई 1991 के अंत में शकेरेह अचानक गायब हो गयी थीं। मार्च 1994 में, केंद्रीय अपराध शाखा, बेंगलुरु ने लापता शकेरेह के बारे में शिकायत की जांच अपने हाथ में ली। गहन पूछताछ के दौरान श्रद्धानंद ने पत्नी की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. शकेरेह के शव को कब्र से निकाला गया और मामले में श्रद्धानंद को गिरफ्तार कर लिया गया।

श्रद्धानंद के वकील ने घटना पर आधारित एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जारी वेब सीरीज का हवाला दिया।उन्होंने कहा, 'मैंने (मुवक्किल ने) एक अपराध किया है। भूल जाने के मेरे अधिकार का क्या होगा?' पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान श्रद्धानंद के वकील ने कहा कि जेल में रहने के दौरान उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं है और उसे सर्वश्रेष्ठ कैदी के लिए पांच पुरस्कार भी मिले हैं। उन्होंने कहा, 'ऐसी स्थिति में, सवाल यह है कि क्या मैं (मुवक्किल) अब भी वही व्यक्ति हूं... जो अपराध के समय था.' बेंच ने पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए कर्नाटक राज्य और अन्य से जवाब मांगा है। बेंच ने याचिका पर सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है।

कोर्ट ने कहा, 'किसी भी आरोपी को दोषसिद्धि के आधार पर मृत्युदंड मांगने का अधिकार नहीं है। आप अपनी जान नहीं ले सकते. आत्महत्या का प्रयास करना भी एक अपराध है इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि अदालत को मृत्युदंड देना होगा।अदालत उचित सजा देगी.' दोषी के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई सजा, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के तहत समय से पहले रिहाई के लिए अर्जी दाखिल करने के श्रद्धानंद के अधिकार को अवरुद्ध करती है. बेंच ने कहा, 'यह (जीवन पर्यन्त आजीवन कारावास की) सजा आपको फांसी से बचाने के लिए दी गई थी।

वकील ने कहा कि अगर यह मृत्युदंड से छूट है, तो यह मृत्यु से भी बदतर नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों को भी फरलो और पैरोल दी गई थी, लेकिन श्रद्धानंद इसके भी हकदार नहीं है. दोषी के वकील ने संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के कथित उल्लंघन का हवाला दिया. बेंच ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसने पहले भी एक रिट याचिका दायर की थी।

  • सुप्रीम कोर्ट का आदेश

पेरारिवलन को रिहा करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है, ‘राज्य मंत्रिमंडल ने प्रासंगिक विचार-विमर्श के आधार पर फैसला किया था। अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए, दोषी को रिहा किया जाना उचित होगा।’ संविधान का अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को यह विशेषाधिकार देता है, जिसके तहत संबंधित मामले में कोई अन्य कानून लागू ना होने तक उसका फैसला सर्वोपरि माना जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारे ए. जी. पेरारिवलन को कोर्ट ने यह देखते हुए 9 मार्च को जमानत दे दी थी कि सजा काटने और पैरोल के दौरान उसके आचरण को लेकर किसी तरह की शिकायत नहीं मिली।

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 विश्वामित्र अग्निहोत्री (B com , MBA ) पेशे से पत्रकार लेखक

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