इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना कारण और आधार बताए की गई गिरफ्तारी को अवैध करार देते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस को दिए सख्त निर्देश।


न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने रामपुर के मंजीत सिंह उर्फ इंदर की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

विधिक आवाज समाचार |प्रयागराज उत्तर प्रदेश 
रिपोर्ट राजेश कुमार यादव |दिनांक 12 अप्रैल 2025

मुख्य बिंदु:

संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन: कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को उसके गिरफ्तारी का कारण और आधार बताना अनिवार्य है। यह संविधान के अनुच्छेद 22(1) और सीआरपीसी की धारा 50 (अब बीएनएसएस की धारा 47) के तहत आवश्यक है। 

डीजीपी को निर्देश: कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि वे एक सर्कुलर जारी कर सभी जिला पुलिस प्रमुखों को इन वैधानिक प्रावधानों का कड़ाई से पालन करने के लिए निर्देशित करें। 

गिरफ्तारी मेमो में खामियां: याची के अधिवक्ता ने बताया कि गिरफ्तारी के समय पुलिस ने एक पूर्व-प्रिंटेड प्रोफार्मा पर गिरफ्तारी मेमो दिया, जिसमें न तो गिरफ्तारी का कारण और न ही आधार का उल्लेख था। यह सीआरपीसी की धारा 50 के उल्लंघन के समान है। 

न्यायिक आदेश रद्द: कोर्ट ने 26 दिसंबर 2024 के गिरफ्तारी आदेश को रद्द कर दिया और याची को रिहा करने का निर्देश दिया। 

यह निर्णय पुलिस द्वारा मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगाने और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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