"इंदौर की मिसाल: हुकुमचंद मिल के वारिसों को मिला इंसाफ़, सालों का इंतज़ार हुआ खत्म"


इंसाफ़ देर से मिले, लेकिन जब मिलता है तो उसका असर पीढ़ियों तक रहता है। इंदौर की ऐतिहासिक हुकुमचंद मिल से जुड़े हजारों श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए एक लंबे संघर्ष और इंतज़ार का दौर आखिरकार खत्म हो रहा है।

विधिक आवाज़ समाचार  |इंदौर
विश्वामित्र अग्निहोत्री सह संपादक   10 अप्रैल 2025

जहां एक ओर 2800 से अधिक जीवित कर्मचारियों को उनका मेहनताना मिल चुका है, वहीं अब प्रशासन ने उनके बाद विधवाओं और वारिसों को उनका वाजिब हक़ सौंपने की ऐतिहासिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह केवल पैसा नहीं, बल्कि एक सच्ची श्रद्धांजलि है उन हाथों को, जिन्होंने मिल के भीतर पसीना बहाया, मशीनों को चलाया और इंदौर की औद्योगिक नींव को मजबूत किया।

अब वारिसों को मिलेगा हक़ – एक नई शुरुआत

प्रशासन ने अब तक 104 वारिसों का वेरिफिकेशन पूरा कर लिया है, और इस सप्ताह उनके खातों में राशि हस्तांतरित करने की तैयारी पूरी हो चुकी है। ये वे लोग हैं जिनके अपने, इस दुनिया से जा चुके हैं, लेकिन उनका हक़ अब भी ज़िंदा है – और अब जाकर उन्हें वह मिल रहा है।

795 थर्ड पार्टी यानी मिल के वारिसों के आवेदन प्रशासन को प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 106 को प्रारंभिक तौर पर सही पाया गया है। इनमें से 100 का वेरिफिकेशन हो चुका है और अगले सप्ताह तक उनके खातों में भी राशि ट्रांसफर कर दी जाएगी।

विधवाओं के दर्द को समझा प्रशासन ने

कहते हैं, व्यवस्था तभी सफल होती है जब वह संवेदनशील हो। इंदौर प्रशासन ने यह बात साबित की है। 1373 विधवाओं ने जब आवेदन दिए, तो उनमें से 1255 को समय रहते भुगतान किया जा चुका है। हालांकि, 93 फॉर्म में दस्तावेजी त्रुटियां और 9 मामलों में दस्तावेजों का मिलान नहीं हो पाने के कारण कार्रवाई रुकी हुई है। प्रशासन हर केस को गंभीरता से देख रहा है ताकि किसी को भी न्याय से वंचित न किया जाए।

प्रशासन की सक्रियता बनी मिसाल

कलेक्टर के निर्देश पर एडीएम निशा डामोर के नेतृत्व में इस संपूर्ण प्रक्रिया को बेहद संवेदनशीलता और पारदर्शिता से अंजाम दिया जा रहा है। क्षेत्रीय पटवारी और तहसीलदारों की सहायता से प्रत्येक वारिस की जानकारी सत्यापित की जा रही है। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई भी परिवार अपने हक से वंचित न रह जाए।

बचे हुए आवेदकों की तलाश जारी

कुछ आवेदक देश से बाहर हैं, कुछ को जानकारी नहीं मिली कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। प्रशासन ऐसे मामलों में भी अपनी भूमिका निभा रहा है, ताकि अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुंचाई जा सके।

एक नई सुबह की ओर

हुकुमचंद मिल एक समय इंदौर की पहचान थी। आज उसके मजदूरों और उनके परिवारों को न्याय मिलना इस शहर की आत्मा को सुकून देने जैसा है। यह केवल मुआवज़ा नहीं, यह उस भरोसे की जीत है जो लोगों ने सालों से व्यवस्था पर बनाए रखा।

शायद पहली बार किसी प्रशासनिक पहल को इतने सुनियोजित और मानवीय ढंग से अंजाम दिया गया है – एक ऐसी पहल, जो पूरे देश के लिए मिसाल बन सकती है।

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